1.
शहर
शाम की शमा
से जवान होती
है
निशा की गोद
में जागती है;
औ
दिवा में स्वप्न
-सी होती है.
शहर
एक ख्याली पुलाव है
यह सपनों का बसेरा
है
मजदूरों का सहारा
है
इज्जतदारों
की मस्ती है
जवानियों कि कश्ती
है.
शहर
एक प्रस्तर का जंगल
है
एक ऐसा विस्तार-
जो गावों को निगल
ले,
एक ऐसा संसार
जो अमृत से
गरल ले.
यहां
उम्र की पाबंदियां बेमानी-सी लगती
हैं
बच्चियां भी सयानी-सी लगती
हैं
उनकी बेफिक्र मासूमियत भी;
सहवास की निशानी-सी लगती
है
बिगाडा है इसने
ख्याल ऐसा
कि पचास की उम्र भी, परेशानी-सी लगती है.
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